शुक्रवार, 17 जून 2011

यही ज़िन्दगी की रीति है.

रिश्ते बनना बिगड़ना तो ज़िन्दगी की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है.हम अपनी पूरी ज़िन्दगी बहुत सारे रिश्ते बनाते हैं और बहुत सारे रिश्ते हमसे जाने अनजाने में छूट जाते हैं.क्या ये सही है?इस बात से बिलकुल इनकार नहीं किया जा सकता कि ये सिर्फ प्रक्रिया ही नहीं बल्कि एक सामाजिक बंधन के रूप में अब देखा जा रहा है.आज कहने को सारे रिश्ते एक मतलबी नामक चादर से ढके हुए हैं और सभी उसी में सो रहे हैं.आज सारा रिश्ता पूरी तरह मतलबी रस्सी से बंधा हुआ है.जब तक कोई मतलब है तब तक वो अपनों की तरह व्यवहार करते हैं और वही मकसद पूरा होने के बाद बिलकुल बदल जातें हैं.जगह जगह रिश्तों से हमें धोखे भी मिलते हैं.पर कुछ हो न हो हमें ऐसे रिश्तों से बहुत बड़ी सीख भी मिलती है.ज़िन्दगी के इस रंग में ऐसे रिश्ते आपको बहुत ज्यादा समझ देते हैं.हर किसी के ज़िन्दगी में ऐसे रिश्ते होते हैं ये सच हैं! इसी में कुछ लोग उसे झेल जाते हैं और कुछ ऐसे रिश्तों के पीछे अपनी पूरी ज़िन्दगी बर्बाद कर लेते हैं.ऐसे रिश्तों पर से पूरी तरह हमारा विश्वास भी हट जाता है.बड़ा दुःख होता हैं न जब कोई अपना ऐसा करता है कितना विश्वास होता है उस पर और वही अपना जिसे हम अपना सब कुछ समझ लेते हैं वो हमें धोखा दे देता है.आज समाज कितना बदल गया है. पहले की अपेक्षा अब ज्यादा मतलबी हो गयी है पूरी दुनिया.परिवार से ही शुरू करें तो आज बेटा माँ बाप से,पति पत्नी से,भाई बहन से,यहाँ तक दोस्त दोस्त से सभी इसी तरह मतलब से जुड़े हुए  हैं,फिर और रिश्तों की आगे बात ही क्या की जाये?यही मतलबी रिश्ते एक सबक और जीने का एक नया सलीका सिखाते हैं.बस शायद अब यही ज़िन्दगी की रीति है.

11 टिप्‍पणियां:

  1. आज सारा रिश्ता पूरी तरह मतलबी रस्सी से बंधा हुआ है.'
    यकीनन .. रिश्ते रिसते हुए से दिख रहे हैं. रिश्तों को उकेरता सुन्दर आलेख

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  2. रिश्ते ..कभी कभी मैं सोचता हूँ कि ये रिश्ते क्या होते हैं ?आप ने बिलकुल सही लिखा है सिर्फ और सिर्फ मतलब पर टिके हुए हैं रिश्ते.जब तक कोई कुछ करने की स्थिति में होता है रिश्ते बने रहते हैं ...और फिर...खैर छोडिये बात बहुत लंबी हो जायेगी.इन मतलबी रिश्तों को मैं बहुत बचपन से महसूस करता आ रहा हूँ.
    एक अच्छे लेख के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

    सादर

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  3. आज सभी रिश्ते मतलब की डोर से जुड़े हैं..बहुत सार्थक रचना..

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  4. नेहा जी, थोड़ा नजर उठाकर भी देखिये सबकुछ गलत नहीं है| ये सच है कि रिश्तों में मतलब ढूंढने की कोशिश होती है लेकिन ऐसा करने वाले चंद लोग हैं, सब तो नहीं हैं| फिर चंद लोगों के लिए रिश्तों पर ही प्रश्नचिन्ह लगाना तो????.... उचित नहीं है|
    और मैं तो मानता हूँ जिस रिश्तों की बुनियाद रेत से रखी जाए उसे तूफ़ान क्या हवा का एक झोंका भी गिरा देगा| इसलिए ज़रुरी तो यह है कि विश्वास रिश्तों के बीच विश्वास की ऐसी दिवार खड़ी की जाये जिसे कोई जलज़ला भी न हिला सके| यह सोच लेना तो कतई जायज़ नहीं है कि जिंदगी की यही रीत है और हम कुछ नहीं कर सकते सिवाय स्वीकार करने के|
    निराशावादी सोच को प्रदर्शित करने से अच्छा है उसका ठोस हल ढूंढा जाये|
    वैसे ये विचार मेरे अपने हैं आप सहमत हो नहीं भी हो सकते हैं

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  5. रिश्तों से विश्वास उठता जा रहा है...बहुत सार्थक आलेख

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  6. नेहा जी बहुत ही सुंदर और सटीक परिभाषा आज के रिश्तों की | आज तो अपने माता पिता भी बिना किसी मतलब के रिश्ता तोड़ देते हैं |

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