शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

कुछ कहूँ ?

मुझे कुछ कहना है,
क्यूँ कहना है
पता नहीं -दिशा  नहीं
समय के सापेक्ष में,
दृष्टि के बोध में,
कुछ कहना चाहती हूँ,
कुछ बुनना -गुनना चाहती हूँ.

7 टिप्‍पणियां:

  1. वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

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  2. बेहतरीन रचना है........ बधाई .....

    मैं तो यही कहूँगा ......



    मन के भीतर की कुछ बाते

    चुभती जैसे चोटिल गांठे

    जी करता सबसे कह जाऊ

    पात्र कथन का ढूंढ ना पाऊ

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  3. हमेशा कुछ न कुछ कहते रहना चाहिये भले ही किसी इंसान से न कह कर कोरे कागज पर खुद को उभार कर .
    अच्छा लिखा है आपने.

    सादर

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  4. बस यही चाहना ही काफी है.इसी बहने कुछ न कुछ कह ही दिया जायेगा.
    सुन्दर पंक्तियाँ.

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